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Saturday, 20 December 2014

अम्बेदकरवाद- राघव

बाबा साहब अम्बेदकर के महापरिनिर्वाण दिवस पर आज कुछ बुद्धिजीवियों के विचार सुनने का मौका मिला। यद्यपि बाबा साहेब के बारे में बहुत ज्यादा पढ़ा नहीं है मैंने, लेकिन फिर भी आज सबकी बातें सुनकर मुझसे रहा नहीं गया। और, फलस्वरूप मैं यह लिखने बैठ गया।
मेरी समझ में एक बात ये आती है कि आपको अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए और लड़ाई में बने रहने के लिए, प्रतीकों की आवश्यकता पड़ती है। समाजवाद, पूंजीवाद, साम्यवाद, गांधीवाद, नारीवाद इत्यादि जितने भी वाद हैं, ये ऐसे ही प्रतिमान हैं जो समय समय पर गढ़े गये। किसी सामाजिक बदलाव के लिए, क्रांति के लिए नहीं ये सभी प्रतिमान गढ़े गये हैं स्वयं को स्थापित करने के लिए। व्यवस्था से असंतुष्ट, उससे रुष्ट कोई आक्रोशित व्यक्ति विद्रोह कर देता है, या कई बार वो सोचता है सिर्फ विचार करता है कि शायद ये होता तो अच्छा होता। ये समाज को साथ लाने के लिए, किसी स्थापित मूल्य की रक्षा के लिए भी हो सकता है और किसी स्थापित रूढी के खिलाफ भी। फिर...फिर वर्षों बाद, जब किसी को ये लगता है कि उसके पास न तो वैचारिक शक्ति है, न ही पर्याप्त साहस, लेकिन वो अपने आपको स्थापित करना चाहता है तो वह अपनी मौलिक विचारधारा नहीं रखता बल्कि पुरानी पड़ी किताबों में बंद कोई बढ़िया आइटम बाहर लाता है जो कि नया नहीं होता, मगर ठीक उसी तरह जैसे जीन्स और टी-शर्ट की पीढ़ी को एक बार कुर्ता कोई अति विशिष्ट और फैशनेबल परिधान लगने लगता है क्योंकि उसके साथ किसी नई कंपनी का ब्रांड होता है। उसी तरह ये पुरानी विचारधारा भी थोड़े से फैशन एलिमेंटस की वजह से मार्केटेबल बन जाती है और फिर गाँधी, आम्बेडकर, मार्क्स के साथ नाम जोड़कर मार्केटिंग का वो नुस्खा अपनाया जाता है जो मसलन दो सौ साल पुरानी चाय बेचने वाली दुकान इस्तेमाल करती है या फिर राजस्थान के शुद्ध वैष्णव ढाबे वाला। यानि कि विचारधारा को पुरानी बताने से वो प्रमाणिक लगने लगती है और उसके साथ नाम जोड़ने से आप किसी ख़ास समुदाय को टारगेट कर पाते हैं माने आपका कंज्यूमर सेगमेंट डिफाइन हो जाता है। फिर क्या है धडल्ले से बेच दीजिये माल। जबतक कोई नया आइटम नहीं आता है मार्किट में चाँदी है आपकी।
 
आज अम्बेदकर पर जिन 'मौलिक बुद्धिजीवियों' को सुना, उससे यहीं लगा कि मार्किट में नया माल ला रहे हैं, अम्बेडकरवाद ओपन मार्किट में लांच नहीं हुआ है मगर xiaomi की तरह सेल शुरू हो गयी है, मार्किट में आएगा कुछ दिनों में। संभव है कि अबतक आपके मन में मेरे प्रति तमाम विशेषणों का पूरा का पूरा एक कोष तैयार हो गया हो। अगर ऐसा है तो कोई नहीं उगल दीजिये। और आपमें से कुछ बुद्धिजीवी मुझ पर दयाभाव दिखाते हुए ये समझने का प्रयास करेंगे कि मैं इतना अधम कैसे हो सकता हूँ। उनके लिए भी है उपचार, तो बात दरअसल ये है की मैं हूँ "ब्राह्मण"। ओह्ह!!! अब तो मुद्दा ही साफ़ है आपको भी समस्या की जड़ नजर आ गयी होगी। सब इस ब्राह्मणत्व का दोष है लेकिन क्या करें प्रकृतिजनित है, हमारा कोई वश तो है नहीं मेरे ब्राह्मण होने पर। अब आप भी मुक्त हैं, मुक्तकंठ से मेरे सम्मान में चालीसा पढकर, मेरे कुल-वंश, और 5000 वर्षों की परम्परा वाला अध्याय पढ दीजिये।
 
आगे का उनके लिए है जो लोग अबतक मेरे सम्मान हेतु कमेंट्स टाइप करना न शुरू कर चुके हों। बात दरअसल ये है कि आज के एक वक्ता बात-बात पर "विरोधी ये कर रहे हैं, वो कर रहे हैं" किये जा रहे थे। "हमको साथ आना होगा" इत्यादि इत्यादि। "ऐसा हो जाये तो सब ठीक हो जायेगा" आदि आदि। बस ये विरोधी कौन है और 'ऐसा' कैसे हो इसपर किसी का कोई मत नहीं। किसी को इस बात से समस्या है कि चुनाव के दिन कोई राजनैतिक दल का प्रमुख यदि अपने घर हवन करा रहा है तो वह सेक्युलर नहीं है। कुमार विश्वास इसलिए घृणा का पात्र है क्योकि उसने मंच पर कविता के बीच ये कहा कि वो मास्टर का बेटा है और ब्राह्मण है। हें....
ब्राह्मण कहा स्वयं को... घोर पाप, घृणित है ये तो। मैं तो कहता हूँ कि डूब मरे कुमार विश्वास- ब्राह्मण पुत्र होने का पाप लेकर जीना कोई जीना है भला। जबतक आप "दलित" न हों आपको अपना वंश बताना कानूनन अपराध है और अगर आप दलित हों तो ये आपका मूल अधिकार है। मगर ये सब बातें धारा 0 के अंतर्गत आती हैं  और सारी की सारी किताबों में नहीं मिलेंगी। इसके अलावा कई उपबंध इस प्रकार हैं कि आप अपना पूरा परिचय देने में यदि 5 पंक्तियाँ बोलें तो कम से कम 3 बार यह बताएं कि आप दलित हैं और कोई भी दुसरा यदि आपको दलित वर्ग का कह दे तो इसे आप अपना अपमान समझें ।
ख़ैर!! आज तक जो कुछ थोडा बहुत मुझको मालूम था कि बाबा साहब बड़े कानूनविद थे, राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र के अच्छे ज्ञाता थे इत्यादि इत्यादि। ये सारे भ्रम आज दूर हो गये और जब ज्ञान चक्षु खुले तो इतना बोध हो गया कि बाबा साहब महामानव थे जो ब्राह्मण शब्द से ही घृणा करते थे। दलित और सिर्फ दलित वर्ग के पुरोधा और नेता। बाबासाहब ने दलित उत्थान के अतिरिक्त अन्य कोई काम नहीं किया।
एक वक्ता ने तो अतिशय प्रभावित किया वो कहते हैं,  "दोस्तों हमें  संगठित होने के लिए पहले एक पैमाना बनाना पड़ेगा कि हमारे साथ आने वाले ये युवा किस मान्यता के हैं?ये उन्ही विचारों को मानते हों जिन्हें हम मानते हों, यद्यपि वाल्मीकि और रैदास को मानने वाले अलग हैं फिर भी वे दलित हैं वे साथ आ सकते हैं लेकिन कोई वेदाभ्यासी हो और गीता पढता हो, जनेउ धारण करता हो तो वो तो ब्राह्मणवादी और दलित विरोधी है।" बेहद सुन्दर, कितना सटीक पैमाना... अहा!!सारगर्भित। भई! बड़े सामाजिक परिवर्तन के लिए चयनित किये जाने वाले लोगों को कसने की कसौटी ऐसी तो होगी ही। हृदय प्रसन्न हो गया, महादेव की कसम। विष्णु ब्राह्मणवादी हो जाते, इसलिए नहीं किया उनका जिक्र।
अभिभूत, मंत्रमुग्ध कर देने वाले वक्ताओं को 2 घंटे सुनकर हृदय की समस्त शंकाओं का निवारण हो गया। एक वक्ता ने आरक्षण के मुद्दे की भी बात उठाई। और बड़ी गंभीर शैली में कहा की "साथियों, आरक्षण का विरोध करने वाले नहीं जानते कि आरक्षण का उद्देश्य क्या है और इसका इतिहास क्या है?" मैं तनिक अतिरिक्त उत्सुकता के साथ सुनने को तत्पर हुआ किन्तु इतने गूढ़ विषय को शायद बता पाना असम्भव था याकि फिर जिस प्रकार अन्य बुद्धिजीवियों के सिर हिले उससे लगा की शायद पहले ही श्लोक में सब छिपा हुआ है और अर्थग्रहण के लिए उसी का अन्वय करना पड़ेगा। अब इतनी योग्यता थी नहीं तो हम उसे वही छोड़कर आगे सुनने लगे जैसे कॉपी में आधे तिहे पन्ने खाली छोड़कर स्कूल में आगे का टॉपिक नोट करने लग जाते थे।
 
बातें इतनी प्रभावोत्पादक थी कि बस जी में ठान लिया कि अब तो बस लड़ना ही है बदल देना है? क्या बदलना है ये सब तो वैसे भी जरुरी नहीं है, बात ये है कि बदलना चाहिए। क्यों बदलना चाहिए? क्योंकि ये जो है वो जो पहले था उसको बदल के आया है। और चूँकि हम ये मान रहे हैं क़ि जो है वो उससे बढिया है जो कि था तो सिद्ध हुआ कि बदलने से भला होगा। बात में दम है और हम सही काम में देरी करते नहीं, और वो भी जब क्रांति वगैरह टाइप के भाव दिल में हों, बिलकुल देर नहीं करते। क्योंकि बड़ा अस्थायी भाव है, न जाने कब ख़त्म हो जाये इसलिए क्रांति की भावना है बस लग लो तुरंत।
अब बदलने के लिए कुछ खास था नहीं, वक्ता लोगों ने चाय वगैरह लिया... बदलना जरुरी था तो डिस्कशन का इशू बदल दिए। बात करने के लिए घर परिवार और तमाम चीजें हैं, बाबा साहब की फिलॉसफी वाला चोंगा तो पार्टी वियर है घंटे दो घंटे से ज्यादा पहनोगे तो फट जायेगा। हमको बंद पंखे के नीचे बैठकर ज्ञान हो गया, बुद्ध बनकर बाहर आये, कदम कैंटीन की और चल पड़े, एक तो चाय पहले भी एक कप ले चुके थे ऊपर से बदलने के लिए ढृढ़प्रतिज्ञ, ब्लैक कॉफ़ी बना के पी लिए। बदलाव हो चुका था और परिवर्तन के भाव भी तिरोहित हो चले थे। परिनिर्वाण दिवस के लिया इतना तो काफ़ी था। शांत, निर्विकार मन लिए बुद्ध की भाँति धीरे धीरे हम कमरे में चले आये।
बाबा साहब अमर रहें।

अगले महापरिनिर्वाण दिवस तक के लिए विदा।

राघवेन्द्र त्रिपाठी 'राघव'  
(लेखक जीवन मैग के संपादन समिति के सदस्य हैं। आप दिल्ली विश्वविद्यालय में बी.टेक/ बी.एस इन इनोवेशन विद मैथ्स एन्ड आइटी के छात्र हैं तथा ग़ज़ल में गहरी रूचि रखते हैं.)


****लेख के विषय-वस्तु से संपादन मंडली का राज़ी होना ज़रूरी नहीं है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जीवन मग परिवार सम्मान करता है। ***

Friday, 14 November 2014

ग़ज़ल: एक दिन- राघव

ज़मीन-ओ-आसमां, और अपनी नज़रों का जहाँ

कर चलेंगे ये सभी तेरे हवाले एक दिन |

वो जो बाक़ी रह गया था रहज़नों से सफ़र में,

राह्बरों ने छीन लिए उनसे निवाले एक दिन |

इन परिंदों से कहो ये सच की धुन को ना कहें

कर के बदनां शज्र इनके लोग जलाएंगे एक दिन |

तुम ये चेहरा क्या दिखाते धूप में झुलसा हुआ?

तुमको दिखलाएंगे हम पैरों के छाले एक दिन |

डर नहीं ये मेरे दुश्मन क़त्ल को बेताब हैं

ग़म है मुझको मेरे अपने मिटाएंगे एक दिन |

आइनों को देख कर चेहरों को चमका लिया

आइनों पे दाग़ को अब मिटाएंगे एक दिन

अब भी खतरे में है सच, सुकरात अब भी मरते हैं

बदले में ये नादां, ज़हर पिलाएंगे एक दिन

ठोकरों से एक ना एक दिन हम संभलना सीख लेंगे,

कोई तो एक बार आकर , हमें संभाले एक दिन |

मैं हार तो गया हूँ पर जद्दोजहद पर अब भी हूँ

देखना दी जाएँगी 'राघव' की मिसालें एक दिन। 



राघवेन्द्र त्रिपाठी 'राघव'  
(लेखक जीवन मैग के संपादन समिति के सदस्य हैं। आप दिल्ली विश्वविद्यालय में बी.टेक/ बी.एस इन इनोवेशन विद मैथ्स एन्ड आइटी के छात्र हैं तथा ग़ज़ल में गहरी रूचि रखते हैं.)
(संपादन में अतिरिक्त प्रयत्न के लिए जीवनमैग के सह-संपादक अबूज़ैद अंसारी को धन्यवाद सहित)


 Roman Text: Ghazal- Ek Din

Zameen-o-asman aur apni nazron ka jahan
kar chalenge ye sabhi tere hawale ek din
wo jo baaki reh gaya tha rahjanon se safar me,
 rahbaron ne chheen liye unse niwale ek din
in parindon se kaho ye sach ki dhun ko naa kahen
kar ke badnan shazr inke log jalayenge ek din
tum ye chehra kya dikhate dhoop me jhulsa hua?
 tumko dikhayenge hum pairon ke chhale ek din
dar nahi ye mere dushman katl ko betaab hain
gham hai mujhko mere apne mitayenge ek din

aainon ko dekh kar chehron ko chamka liya
aainon pe daag ko ab mitayenge ek din
ab bhi khatre me hai sach, sukrat ab bhi marte hain
badle me ye naadan, zahar pilayenge ek din
thokron se ek naa ek din ham sambhalna seekh lenge
koyi to ek baar aakar, hamen sambhaale ek din
main haarf to gaya hoon par jaddojahad par ab bhi hoon
dekhna dee jayengi "raghav" ki misalen ek din

- Raghavendra Tripathi "Raghav"

Monday, 20 October 2014

साहित्य की बात, राघव के साथ-1

यूँ तो मेरा काम इस बार के इस कॉलम में शायरी, ग़ज़ल, या कविता लिखने के तरीके पे कुछ लिखना था| मगर अभी तो शुरुआत हुई है इसलिए मैंने सोचा की बेहद टेक्निकल होकर, कविता और ग़ज़ल के व्याकरण पर बात करने से पहले थोडा तवारुफ़ कर लें|
अब शायरी करना, ग़ज़ल लिखने के लिए स्कूल तो नहीं बनाये जा सकते, यह फ़न, यह हुनर कहीं किताबें पढ़कर नहीं सिखा जा सकता| बशीर साहब ने कहा था, “दुनिया में कहीं इनकी तालीम नहीं होती, दो चार किताबों को बस घर में पढ़ा जाता है”| ये गज़लसराई का हुनर भी कुछ ऐसा ही है| फिर आप ये भी पूछेंगे कि जब ये हुनर सिखाने से सीख नहीं सकता कोई, जब इसे बताया जा नहीं सकता तो इस कॉलम का क्या मतलब है भाई? तो हुजूर, बात को एक बार फिर से जरा ग़ौर से देखने और समझने की जरूरत है| यूँ तो आप ग़ज़ल का व्याकरण पढकर ग़ालिब और मीर नहीं बन सकते, मगर फिर भी जरुरी है कि आप इसे जानें| सिर्फ लिखने के लिए, ग़ज़ल को पढ़ पाने के लिए भी, अच्छी ग़ज़ल की तारीफ कर पाने के लिए जरुरी है कि आप जानें| यकीन मानिये, जब किसी के आश’आर पर तालियाँ बजती हैं, सब लोग वाह-वाह कर रहे होते हैं, उस वक्त वो गज़लसरा ये ढूंढ रहा होता है की इस भीड़ में कौन है जो शायरी समझता है, जो इन  अश’आर के मानी समझता है, और अगर कोई सच्चा सुनने वाला मिल जाये तो फिर सुनाने का मज़ा आ जाता है, वर्ना फिर ग़ज़ल पढना सिर्फ एक रस्म-अदायगी मात्र बन जाती है| और एक बात यह भी है कि जैसे कि कबीर ने कहा था, “हीरा तहाँ ना खोलिए जहाँ कुंजरों की हाट . . . ” एक अदीब शख्स अपने नायाब हीरे तबतक आपके सामने नहीं खोलेगा जबतक कि उसको ये अंदाज़ा नहीं होता की आप उस लायक हैं| जब कोई अपनी रचना पढ़ रहा होता है, उसे सबके सामने रख रहा होता है तो आपको अंदाज़ा हो या न हो, वो तमाम राज़, तमाम बातें आपसे कहने को मुखातिब होता है जो उसने अपने दम भर खुद से भी छुपा रखा हो, ऐसे में ये उसके लिए आसान नहीं होता, इसलिए वो चाहता है कि उसके श्रोता अच्छे हों|
इस कॉलम में हम ग़ज़ल लिखना नहीं बल्कि ग़ज़ल को एप्रेसीएट करना सीखेंगे | उम्मीद है की आप इससे मुतास्सिर होंगे और अच्छी ग़ज़लों को पढ़ पाएंगे, सुन पाएंगे, समझ पाएंगे, और शायद लिख भी पाएंगे | ग़ज़ल, शायरी या कविता को समझ पाना शायद लिख पाने से ज्यादा कठिन काम है क्योंकि लिखने वाला तो खुद नहीं लिखता, भावनाएं बहा ले जाती हैं, शब्द बहने लगते हैं, बस लिखने वाला तो उसके प्रवाह को थोडा संवार देता है, रचनाओं में उसको जब महबूब दिखने लगता है तो वो अपने महबूब को जितना सजा पाता है सजाता है, मगर श्रोता या पाठक की जिम्मेदारी उससे बड़ी होती है| पाठक या श्रोता को बहुत दूर-दूर तक जाना होता है और कई बार वो जब लिखने वाले के स्वभाव, उसके परिवेश, उसकी संस्कृति, उसके इतिहास को नहीं जनता होता तो वो असली मायने नहीं जान पाता, वो वहां पहुच नहीं पाता जहाँ उसे जाना होता है| भावना का ज्वार उठा देना बेशक कविता का काम है इसलिए इसकी जिम्मेदारी लिखने वाले के सर पर होती है, मगर उसकी खूबसूरती को देख पाने के लिए कुछ कदम चलकर किनारे तक आना सुनने वाले की भी जिम्मेदारी है| हमारी कोशिश ये रहेगी कि हम खुद भी ज़िम्मेदारियों के लिए तैयार हो पाएं और आपको भी एक अच्छे पाठक, एक अच्छे श्रोता और एक अच्छे कवि की ज़िम्मेदारियाँ बता ज़िम्मेदार बना सकें|
एक अच्छी रचना के लिए (लिखने और पढने दोनो के लिए) आपको बहुत कुछ जानना होता है, समझना होता है मसलन जुबान, थोड़ा इतिहास और यूँ ही थोड़ा-थोड़ा बहुत कुछ| जैसे अब परवीन शाकिर एक नज़्म में लिखती हैं, 
 “मैं वो लड़की हूँ,
    जिसको पहली रात
          कोई घूँघट उठा के ये कह दे ---
                  मेरा सबकुछ तुम्हारा है, दिल के सिवा |”

अब इसको समझने के लिए भारतीय उपमहाद्वीपीय प्रेम की परम्परा का कुछ अनुभव तो होना चाहिए| इसी तरह जब भी एक शायर शीरीं-फरहाद का ज़िक्र करता है तो आपको उनके बारे में मालूम होना चाहिए| जब मीर कहते हैं : 
“क्या कहिये अपने ‘अहद में जितने अमीर थे,
टुकड़े पे जान देते थे, सारे फ़कीर थे||” 

अब ये शेर समझने ले लिए सं १७००-१८०० की दिल्ली के बारे में आपको मालूमात होनी चाहिए वर्ना आप न जाने क्या अर्थ निकालेंगे? और फिर ये सब जानने के आलावा जुबां जानना भी बहुत जरुरी है, और उससे भी बढ़कर है लफ़्ज़ों का सलीके से इस्तेमाल करना आना अब ज़ाहिर है की लफ्ज़ तो आप सीख सकते हैं मगर उन लफ़्ज़ों की कारीगरी को समझने के लिए आपको पढना पड़ेगा, ठीक वैसे ही जैसे ताजमहल के शिल्प को देखने के बाद ही आप समझ सकते हैं की उसकी क्या खूबी है|
अब देखिये परवीन शाकिर एक नज़्म में कहती हैं –
 “... तुमने मेरा स्वागत उसी अंदाज़ में किया,
 जो अफासराने-हुकूमत के एटीकेट में हो|” 
अब इसमें जिस खूबसूरती से अंग्रेजी के लफ्ज़ मिल जाते हैं कि एकबारगी आपको महसूस भी नहीं होता की कैसे आपने भाषाओँ की सरहद तोड़ दी है| और ये इकलौता उदहारण नहीं है बशीर बद्र की शायरी में जब आप पाते हैं कि  
वो जाफरानी पुलोवर उसी का हिस्सा है, 
कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे
"  
या फिर 
थके थके पेडल के बीच चले सूरज,
 घर की तरफ लौटी दफ्तर की शाम।” 
ये भाषा को खूबसूरती से जोड़ने का तरीका है, ये हुनर लिखते हुए, पढ़ते हुए ही आयेगा| हाँ, मगर इस हुनर की तारीफ करना तो हम आप मिलकर सीख ही सकते हैं| ग़ज़ल या छंद के व्याकरण और जुबां के तमाम कायदे कानूनों के बाद, बहुत कुछ नया करने की आज़ादी भी है, ये जरुरी नहीं की लिखने से पहले आप हर चीज़ को व्याकरण के पैमाने में नाप तौल कर देखें, और कई बार आप जान बुझ कर व्याकरण के उन नियमों को चुनौती देते हैं| इस तरह से लेखन में भी बहुत कुछ नया होता रहता है, इनोवेशन का स्कोप है लिखने में भी| हां मगर इसके लिए आपको पहले तैयार होना चाहिए, व्याकरण के नियमों को न मानना और न जानना दोनो अलग बातें हैं| तो आप जानिए सबकुछ फिर आपकी मर्ज़ी है, आपके अपने बिम्ब हैं, अपनी स्टाइल है, सिर्फ कुछ पुराने नियमों की वजह से आप उनसे समझौता नहीं कर सकते|
कुल मिलाजुला कर हम इस कॉलम में यूँ ही कुछ हलकी-फुलकी बातें करेंगे| कभी कुछ व्याकरण की बातें करेंगे| कभी कुछ गज़लें, कवितायेँ ऐसी भी पढेंगे जिसमे कुछ नया जानने और सीखने को मिले|
और अंत में बस इस सबके बहाने कुछ गज़लें कहना, कुछ सुनना शायद सीख लें|
आख़िर  में बशीर बद्र का एक शेर :
            मुसाफ़िर हैं हम भीमुसाफ़िर हो तुम भी, 
              किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी। 


राघवेन्द्र त्रिपाठी 'राघव'  
(लेखक जीवन मैग के संपादन समिति के सदस्य हैं। आप दिल्ली विश्वविद्यालय में बी.टेक/ बी.एस इन इनोवेशन विद मैथ्स एन्ड आइटी के छात्र हैं तथा ग़ज़ल में गहरी रूचि रखते हैं.)

Wednesday, 28 May 2014

राघवेन्द्र त्रिपाठी की गज़ल

अपनी खुदाई का एहसास हो चला मुझको,
मुझे देख आँखों ने उसके वजू कर लिया ||
उसके इन्साफ के हम तो कायल हैं राघव,
मुझको गुलशन दिया,तो रंगो-बू ले लिया||
इक परिंदा था दिल,पर फडफडाता हुआ सा,
उसकी आँखों ने क्यूँ सब आरजू कह दिया||
उसने बचने की कोशिश लाखो की लेकिन,
इक नज़र ने अखारिश उसको छू ही लिया||


राघवेन्द्र त्रिपाठी 'राघव'  
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में बी.टेक/ बी.एस इन इनोवेशन विद मैथ्स एन्ड आइटी के छात्र हैं.)

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Thursday, 8 May 2014

प्रिय- राघवेन्द्र त्रिपाठी



इस अनजाने अपनेपन की प्रिय, मैं नहीं चाहता कोई वर्णन कोई परिभाषा हो ||
                       मेरे जीवन की सुप्त चेतना ,
                        तेरे नयनो में होती विम्बित |
                        मेरा पथ आलोकित करती ,
                        तेरे संग की मीठी स्मृति ||
इससे ज्यादा इस सुप्त ह्रदय में मैं नहीं चाहता बाकी कोई भी अभिलाषा हो ||
                         बस मेरे मानस अम्बर पर,
                         काले मेघों सी छा जाना ||
                          जीवन के मेरे मरू-थल में ,
                         इक बार प्रिये तुम आ जाना ||
ये दग्ध ह्रदय अपना, मैं नहीं चाहता, प्रिय,चिर विरही चातक प्यासा हो ||
                          मेरे मानस आले में तुम हो,
                           प्राणों में प्रिय तुम्ही शेष ||
                          है अंतिम बार यही इच्छा ,
                         देखू जी भर कर तुम्हे निमेष||
हो ध्येय पूर्ण यह जीवन का,मई नहीं चाहता बाकि कोई भी इच्छा,आशा हो ||
                         मौन अधर के प्रश्न सुन सको,
                         मूक नयन से प्रत्युत्तर दो प्रिय||
                        इस पथरीले पथ पर जीवन के ,
                       आकर मुझको सम्बल दो प्रिय ||



राघवेन्द्र त्रिपाठी 'राघव'  
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में बी.टेक/ बी.एस इन इनोवेशन विद मैथ्स एन्ड आइटी के छात्र हैं.)















Excerpted from- Jeevan Mag Feb.- march 2014 issue

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